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मै नन्ही गौरैया(by सनी कुमार)

  • aromaclasses18
  • Dec 21, 2024
  • 1 min read

मैं नन्ही सी गौरैया

बागों में चहचहाती थी

घर आँगन में चीं-चीं करके

दाने चुग कर जाती थी,

छोटा सा आशियाना मेरा

घर का एक सबसे छोटा कोना

वृक्षों में भी है मेरा एक सबसे छोटा आशियाना

हर आँगन बाग-बगीचे

सब जगह में चहचहाती थी

हो अगर कही कुछ दाने तो

वो थोड़ा चुग जाती थी

वक्त बदला लोग बदले,

बदला घर-आगन का कोना

बाग-बगीचे दिख नहीं रहे

कहाँ है मेरा आशियाना

चीं ची करके उड़ रही हूँ

ढूंढ रही हूँ एक कोना

मिले तो बता दो कहाँ खो गया

मेरा आशियाना

भूख प्यास से व्याकुल होकर

गर्मी में अब - तड़‌प रही हूँ

बची - कुची जान लेली

मोबाइल टावरों ने

नन्ही होकर भी छिप रही हूँ।



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यह कविता हमारे प्रिय छात्र सनी कुमार

(कक्षा -6) द्वारा भेजी गई है । सनी कुमार आपको आपके भविष्य के लिए बहुत सारी शुभकामनाएं ।

अगर आप भी हमे अपनी कविता ,कहानी भेजना चाहते हैं तो हमे मेंल कर सकते हैं



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